तबले की बला बंदर के सिर
Table ki Bala Bander ke Sir
एक दिन दादाजी अखबार पढ़ रहे थे। दादीजी दाल बीन रही थीं। अमर और लता अपना स्कूल का काम कर रहे थे।
“वाह! यह भी खूब रही!” अखबार पढ़ते-पढ़ते दादाजी बोले-“एक लड़का था। वह शराब पीता था और जुआ खेलता था। अमीर बाप का बिगड़ा हुआ शहजादा था। एक दिन वह अपने घर से रुपये-पैसे लेकर भाग गया।
उसके माँ-बाप ने पुलिस को खबर कर दी कि उनके घर में चोरी हो गई है। पुलिस चोरी के शक में घर के नौकर को ही पकडकर ले गई। इसे कहते हैं तबले की बला बंदर के सिर। यानी गलती को कोई और सजा किसी और को दी जाए।”
“दादाजी, यह तो बड़ी मजेदार कहावत है। इसकी क्या कहानी है? सुनाओ न, दादाजी!” लता ने जिद की।
अच्छा तो सुनो!” दादाजी ने कहानी शुरू की- एक पंडित जी थे। मंदिर के पिछवाड़े ही उनका घर था। मंदिर के आँगन में पीपल का एक पेड़ था। उस पेड़ के ऊपर कुछ बंदर रहते थे। कुछ लोग बंदरों को केला, अमरूद, आम आदि फल खाने को दे देते थे। बंदर खाते-पीते, मौज-मस्ती करते और पेड़ पर ही सो जाते।
“पंडित जी का एक बेटा था। उसका नाम था सूरज। पंडित जी उसे तबला बजाना सिखाते थे। उन्होंने सोचा कि उनका बेटा तबला बजाना सीख जाएगा तो किसी भजन-कीर्तन मंडली में शामिल हो जाएगा। सूरज अच्छी तरह तबला बजाने लगा। उसे तबला बजाने की धुन सवार हो गई। वह जल्दी ही एक भजन-मंडली में शामिल हो गया। पंडित जी ने एक सुंदर-सुशील कन्या के साथ सूरज का विवाह कर दिया। सूरज हर समय तबला बजाने की धुन में डूबा रहता। घर में दिन-रात तबले की तक-धिन, तक-धिन की आवाज गूंजती रहती। उसे खाने-पीने की सुध भी नहीं रहती थी। तबले की गूंज की वजह से पंडित जी पूजा-पाठ भी ठीक से नहीं कर पाते थे। पंडित जी सोचते-“अरे, पागल हो गया है क्या?
रात-दिन तबला बजाता रहता है। न पूजा-पाठ करने देता है, न आराम से सोने देता है।
“पंडित जी ने एक दिन सूरज को बहुत समझाया-‘बेटा, तबला बजाना अच्छी बात है, लेकिन किसी भी काम की अति खराब है। तुम थोड़ी-बहुत देर तबले पर अभ्यास कर लिया करो।’ लेकिन सूरज ने अपने पिताजी की बात नहीं मानी। वह बोला-‘पिताजी, आपने ही तो मुझे तबला बजाना सिखाया है। फिर आप क्यों मना कर रहे हैं?’ अपने बेट। की बात सुनकर पंडित जी को गुस्सा आ गया। परंतु वह मन-ही-मन खून का पूंट पीकर रह गए। उसी समय एक बंदर उनके पास आकर बैठ गया। पंडित जी तो क्रोध की आग में जल रहे थे। उन्होंने आव देखा न ताव, पास में रखा पीतल का लोटा बंदर को दे मारा। बेचारा बंदर दर्द से चिल्लाता हुआ भाग खड़ा हुआ। पास ही पंडिताइन बैठी हुई सब कुछ देख रही थी। उससे न रहा गया और बोली-‘वाह पंडित जी, यह भी खूब रही। तबले की बला बंदर के सिर! भला उस बेचारे बंदर ने आपका क्या बिगाड़ा था?’ ” दादाजी ने कहानी समाप्त की। अमर ने कहा-“दादाजी, यह तो बहुत ही मजेदार कहानी थी। इससे हमें एक सीख भी मिलती है कि कभी भी गस्से में आकर ऐसा काम नहीं करना चाहिए जिससे किसी की गलती की सजा दूसरे को मिल जाए। है न, दादाजी!”
“हाँ, बेटा! बिलकुल ठीक। हमें अपनी खीज दूसरों पर नहीं उतारनी चाहिए। ऐसा काम नहीं करना चाहिए कि बाद में पछताना पड़े।” दादाजी ने समझाया।

